जुलाई 2017

विकसित अर्थव्यवस्थाओं में ग्रोथ कंस्ट्रेंट (विकास के अवरोध)

विकसित अर्थव्यवस्थाओं में ग्रोथ कंस्ट्रेंट (विकास के अवरोध) के बारे में बताते हैं टाटा सर्विसेज के ईकोनॉमिक एडवाइजर डॉ सिद्धार्थ रॉय कि क्योंविकसित अर्थव्यवस्थाओं को अपर्याप्त निष्पादन और धीमे विकास के समस्या से जूझना पड़ता है

यदि हम वर्तमान में विकसित अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करने दीर्घकालीन संरचनात्मक मुद्दों को स्पष्ट समझना चाहते हैं तो हमें ‘पोटेंशियल ग्रोथ’को समझना होगा। पोटेंशियल ग्रोथ वह दर होती है जिस पर कोई अर्थव्यवस्था संभावित रूप से वृद्धि कर सकती है, यानी जब आर्थिक संसाधनों को दक्षतापूर्वक इस्तेमाल किया जाए तो कैपेसिटी आउटपुट ग्रोथ की समग्र क्षमता।

जब वास्तविक एवं संभावित आउटपुट नकारात्मक हो तो इसका अर्थ होता है कैपेसिटी आउटपुट ग्रोथ धीमा है, जो कि क्षमता के अपर्याप्त इस्तेमाल अथवा कमजोर निष्पादन को दर्शाता है; परिणामस्वरूप, यह भविष्य में कम निवेश होने की स्थिति को भी उजागर करता है। ऑर्गनाइजेशन फॉर ईकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट के अनुसार, 2016 में, यूएस, यूके, यूरो क्षेत्र (यूरो अपनाने वाले देश) तथा अन्य बहुत से विकसित अर्थव्यवस्थाओं में आउटपुट गैप नकारत्मक था।

2008 की मंदी को अब नौ साल बीत चुके हैं। यूएस, यूके, यूरो क्षेत्र तथा जापान जैसे विकसित देशों को कमजोर निष्पदन और धीमी संवृद्धि की सतत समस्या का सामना क्यों करना पड़ रहा है? यह कॉलम दो कारणों पर फोकस करता है, दोनों के दीर्घकालीन निहितार्थ हैं।

सेक्युलर स्टैगनेशन
सेक्युलर स्टैगनेशन का अर्थ है मांग में ठहराव। सामान्य व्यवसाय चक्र में, उतार-चढ़ाव कुछ सालों तक एक दूसरे के बाद आते रहते हैं। सेक्युलर स्टैगनेशन की स्थिति में मांग में सुधार आने में समय लगता है।

इस चक्र को तोड़ने के लिए, निवेश को बढ़ाना महत्वपूर्ण होता है। यूएस कॉरपोरेट सेक्टर माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और ऐपल जैसी कंपनियों की सफलता से चालित है। ये अति उच्च स्तर के रिटेंड आय दर्शाते हैं जिससे निवेश के अवसरों का अभाव दिखता है। नए संवृद्धि क्षेत्रों में पूंजी निवेश अपेक्षाकृत कम होती है। ऐसी कंपनियों के लिए नए तकनीकी क्षेत्र अधिक बौद्धिक पूंजी-सघन होते हैं; भौतिक पूंजी में निवेश सीमित है। इस प्रकार, बचत और निवेश के बीच अतारतम्यता जारी रहती है। परिणामस्वरूप, यूएस में कॉरपोरेट सेक्टर सरकारी क्षेत्र का निवल ऋणदाता होता है। तुलनात्मक रूप से देखें तो, भारत में कॉरपोरेट सेक्टर निवल कर्जदार होता है।

इस परिस्थिति के मद्देनजर, धीमी विकास दर की स्थिति को तोड़ने की क्षमता रखने वाला एकमात्र सेक्टर, कम ब्याज और कम मुद्रास्फीति वाला ‘सेक्युलर स्टैगनेशन ट्रैप’ सरकार है। इसे अकोमोडेटिव वित्तीय नीति के अनुसार बड़े इनफ्रास्ट्रक्चर प्रॉजेक्ट चलाने पड़ते हैं ताकि ट्रांजेक्शन लागत में कमी आए और प्रतिस्पर्धा एवं रोजगार में सुधार आए।

वास्तविक ब्याज दर 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड के लिए कम हुए हैं
  1996 2016
यूएसए 3.5 1.2
ब्रिटेन 5.1 0.5
जर्मनी 4.5 -0.2
जापान 2.6 0.2

कम उत्पादकता संवृद्धि
आइए संवृद्धि में ठहराव के अन्य कारण : कम उत्पादकता संवृद्धि को देखें। आगे बढ़ने से पहले सकल उत्पादकता संवृद्धि की अवधारणा से परिचित होना आवश्यक है। कोई भी कामगार प्रति घंटा कितना उत्पादन करता है यह उसकी उत्पादकता है जो एक ओर पूंजी तथा श्रम पर निर्भर करती है और दूसरी ओर तकनीकी प्रगति तथा नवप्रवर्तन पर। अर्थशास्त्रियों के पास नवप्रवर्तन, बेहतर सिस्टम और तकनीकी प्रगति के प्रभाव को नेट आउट करने की विधि होती है; इसे कुल फैक्टरी उत्पादकता कहते हैं। ऐतिहासिक अध्ययन दर्शाते हैं कि कैसे यह विकसित अर्थव्यवस्थाओं में उत्पादकता संवृद्धि का मुख्य योगदानकर्ता होता है। 1920-70 की अवधि में, अमेरिका की कुल उत्पादकता में वृद्धि 1.89 प्रतिशत सालान की दर से हुई; 1970-94 में यह दर 0.57 प्रतिशत सालाना रह गई, आईटी, इंटरनेट और बेहतर संचार तकनीक की बदौलत यह 1994-2004 में बढ़कर 1.03 प्रतिशत हुई। आश्चर्यजनक रूप से, 2004 से 2014 के बीच यह गिर कर 0.4 प्रतिशत हो गई। उत्पादकता की इस धीमी गति से दीर्घकालीन आर्थिक संवृद्धि प्रभावित होगी।

अमेरिकी जीवन मानक को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा कारक उत्पादकता है। जब व्यवसाय अधिक उत्पादक और दक्ष होता है, तो उनका विस्तार होता है, जिससे रोजगार और वेतन में वृद्धि होती है।

अनेक उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में, यह एक गहरी संरचनात्मक बीमारी को जन्म देता है, इसलिए उन्हें निम्न जीडीपी विकास अयन से बाहर निकलने में कई साल लग जाते हैं। कई अन्य कारक हैं जो नकारात्मक प्रभाव डालते हैं जैसे- ब्रेक्जिट, बॉर्डर टैक्स, एंटी-इमीग्रेशन उपायों और ईयू के बैंको में उच्च गैर-निष्पादनकारी परिसंपत्तियां। ठहराव दर्शाने वाली उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के साथ, भारत जैसे विकासशील देशों को उन विकसित देशों से सस्ती निधि और निवेश की सहायता लेनी पड़ती है जो बदले में लाभ चाहते हैं। यह उन्नत अर्थव्यवस्थाओं का दूसरा पक्ष है, यानी कि एक रजत अस्तर जो विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को लाभ पहुंचा सकता है।